Sunday, March 22, 2009

फागुन

अतीत .. फागुन महीना कच्चे रंग सर्द - गर्म रातें लहलहाते खेत वर्तमान... रोशन शहर लम्बी सड़कें अंधी दौड़ वक़्त की बेंत सच ... वो लम्हे वो रिश्ते वो यादें मुट्ठी भर रेत - विजय (२२ मार्च २००९)

Wednesday, May 07, 2008

Raahi

इतने मज़बूत नही दिखते रिश्तों के रेशे
टूट जाऊँगा मगर जो इनको तोड़ना चाहूँ
रोज़ चलता हूँ कि तुझ तक पहुंचूं लेकिन
मुझे ले लौट्तीं हैं रोज़ ये राहें ख़ुद पर
डूबता रोज़ हूँ कि तेरी तह तक तो पहुंचूं
मुझमे जो मैं है मुझे फिर से उठा लेती है
ढूँढता हूँ आग मे पानी में हवाओं मे तुझे
मांगता हूँ सहरा से सागर से पहाडों से तुझे
तू है आस पास धुएं में परछाई की तरह
साँस लेता हूँ तो तू मुझसे जुदा हो जाता है

- महफूज़

Monday, May 05, 2008

विवर्तन - इंतज़ार

बीस साल गुज़र गए
मछलियाँ पकड़
दो वक्त की रोटी कमाने
समुन्दर की लहरों से जूझता हुआ
गया था वो


वो अब तक नही लौटा


उसकी राह तकती आंखों में
पिघलता धुआं है
धुएं में समुन्दर की लहरें


कई बरसों दूर के किनारों से
धीरे धीरे बहती आती है
एक छोटी सी नांव -

बापू के हाथ के निवाले के इंतज़ार में
नींद में डूबे आंखों का सपना


आँगन के कुएं का पानी
कौन खारा कर गया -
एक अभागन के आंसू या समुन्दर की लहरें ?




(चित्रा के. पी. की मलयालम कविता का विवर्तन)

അരിയും മുളകും
വാങ്ങാന്‍
മത്തിക്കായ്‌
കടലില്‍ പോയവന്‍
ഇരുപതു കൊല്ലം കഴിഞ്ഞും
മടങ്ങി വന്നില്ല.
കാത്തിരിക്കുന്നവളുടെ
പുകയലിഞ്ഞ കണ്ണുകളില്‍
കാണാം,
ഒരു കടല്‍.
വര്‍ഷങ്ങള്‍ക്കക്കരെ നിന്ന്
തീരത്തേക്ക്‌
തുഴഞ്ഞടുക്കുന്ന
ഒരു കുഞ്ഞു വള്ളം.
വാപ്പയൊടൊത്തുണ്ണാന്‍
കാത്ത്‌, മയങ്ങിപ്പോയ
കുഞ്ഞുകിടാങ്ങളുടെ സ്വപ്നം.
വീട്ടുമുറ്റത്തെ
കിണര്‍ വെള്ളത്തിലുപ്പ്‌ ചേര്‍ത്തത്‌
അവളുടെ കണ്ണീരോ കടലോ

Monday, April 21, 2008

काश ........

तुम न तुम रहोगे हम हम न रहेंगे
आलमी झगडे भी कायम न रहेंगे

तुमसे-हमसे कोई खादिम न रहेंगे
उनके जैसे कोई हाकिम न रहेंगे

न अजनबी रहेंगे गीता-कुरान-बाइबल
गुमराह करने वाले आलिम न रहेंगे

भूका न होगा कोई न मजबूर रहेगा
दौर-ऐ-हयात फिर कोई ग़म न रहेंगे

न मज़लूमों पे फिर तलवारें चलेंगी
ये मौत के फ़रिश्ते ज़ालिम न रहेंगे

सबको मिलेगी छत पहनने को कपड़े
थकी थकी ये आंखें अब नम न रहेंगे

हर तरफ़ फैला चैन-ओ-अमन रहेगा
घुटे से बेपरवाह मरासिम न रहेंगे

मशरूफियत में डूबे दिन-रात ढलेंगे
फुर्सतों के पल भी कुछ कम न रहेंगे

कैसे ख्वाब तूने महफूज़ बुन दिए हैं
क्या सभी खुदा बनेंगे आदम न रहेंगे



- महफूज़ २२ अप्रैल २००८

एक ग़ज़ल

ग़म छुपाना हुनर सा लगे है
आंसू आए तो डर सा लगे है

तुम जब भी साथ होती हो
वही पल मुक्तसर सा लगे है

बस यूँही आते जाते रहो
तुमसे ये घर घर सा लगे है

अब के शायद लौटूँगा नही
ये आखिरी सफर सा लगे है

चेहरा रोशन है उदास दिल
तू भी अब इस शहर सा लगे है

सियाह रात के आँचल के परे
हर उजाला सेहर सा लगे है

महफूज़ यकीनन कोई नही
वक्त की मार खंजर सा लगे है


- महफूज़ १८ अप्रैल २००८

Saturday, April 12, 2008

Nazariya

दिसम्बर
एक लड़की है
निर्वस्त्र

जनवरी
सिर पर पगड़ी बांधे
एक बदमाश

जब जनवरी ने दिसम्बर को
पहली बार देखा
अपनी पगड़ी उतार
दिसम्बर की नग्नता को ढंका
फिर दोनों में प्रेम हुआ, रास हुआ
लीला हुई

इकत्तीस की आधी रात को
उनके पालने में
एक नन्ही जान ने कदम रखे
"नया साल"

जो कुछ इनके अलावा हैं
और इनके बाद हैं
मात्र उस नन्हें के खिलोने हैं

Ghazal - Ujaale ke khwaab

सूरज चले सोने और रात हो जाए
घनघोर घटा छाये बरसात हो जाए

झूम उठें शजर गायें हवाएं मल्हार
भीगे भीगे से अपने हालात हो जाए

सावन ने नही छोड़ा किसी को तन्हा
शायद इसी बहाने मुलाक़ात हो जाए

नज़रें मिलीं हैं उनसे कई बार मगर
अब के मिलें तो कुछ बात हो जाए

जुल्फों से टपकते हैं मोती बन के बूंद
नेमत है उनकी यही खैरात हो जाए

गरजते बादल यह खड्कती बिजली
या रब वस्ल के यही आलात हो जाए

शिद्दत से अब यहाँ कुछ भी नही हासिल
वही बात मुकम्मल है जो बेबात हो जाए

"महफूज़" अब उजाले में देखता है ख्वाब
बेकाबू न इसके जज़्बात हो जाए


- महफूज़ - १३ अप्रैल २००८

Ghazal - Main

मेरी फितरत है बिखरना बिखर जाऊँगा
फैल जाऊँगा हर सिमट जिधर जाऊँगा

सोना हूँ जितना चाहे जलाओ मुझको
जेर कुन्दन हूँ हर हाल निखर जाऊँगा

अपने ईमान का मुद्दई मुंसिफ ख़ुद हूँ
फैसले के लिए और किधर जाऊँगा

न मिलने पे मेरे खफा होते हो क्यूँ इतना
आंसू न थमेंगे जब मिलके बिछड़ जाऊँगा

महफूज़ हूँ वक्त कि पहलू में साँस लेता हूँ
जिस रोज़ वह खफा होगी गुज़र जाऊँगा


- महफूज़ - ८ अप्रैल २००८

Ghazal - आग

हर इक मंजिल हो रहगुज़र जैसे
ज़िंदगी बेइन्तेहाई सफर जैसे

देखे से भी दिखता नही कोई जानिब
ज़ुल्म ने दी हो ढांक नज़र जैसे

क्या तौबा करूं क्या खुदा का नाम लूँ
निभ जायेगी हुई है बसर जैसे

आग उतनी ही अब भी है दिल में लेकिन
आंच ठंडी है रोके हूँ सबर जैसे

इक अफ़साने सा लगे तेरा आना
पुरानी कोई दुआ का असर जैसे

सलामत रहे अमन जहाँ भी रहे
मैं भी "महफूज़" हूँ इधर जैसे



महफूज़ - ७ अप्रैल २००८

गुलमोहर - विवर्तन

कुछ ऐसी भी औरतें होतीं हैं
जो गुलमोहर की याद दिलातीं हैं
फूलों से लबालब
क्रांति की लालिमा लिए

उनकी छाँव हमेशा
बढ़ते रहने का
पर्याय हो जैसे
और इसी तरह
कितनी सहजता से
उनके पत्ते दिखा देते हैं आसमान


अंकुर इनके
लाल नाखून, जैसे हो किसी
बचपन के सखी की खिलखिलाहट

यह पेड़
मात्र एक सराय है थके पथिक के लिए
नीड नही बनाने देती हैं इनकी डालियाँ

धरती को चूमती लताओं पर
झूलते कौवों और मैनों की समानता में
मदमाता हुआ एक असामान्य पेड़




विजय (c) २० मार्च २००८
-(राज नीटियाथ की कविता का
हिन्दी में विवर्तन)

मुझे अफ़सोस है सोना....-गुलज़ार

मुझे अफ़सोस है सोना....

के मेरी नज़्म से हो कर गुज़रते वक्त बारिश में,
परेशानी हुई तुमको
बड़े बेवक्त आते हैं यहाँ सावन,
मेरी नज्मों की गलियाँ यूं ही अक्सर भीगी रहती हैं-
कई गड्ढों मैं पानी जमा रहता है,
अगर पाँव पड़े तो मोच आ जाने का खतरा है-
मुझे अफ़सोस है लेकिन---

परेशानी हुई तुमको के मेरी नज्म में कुछ रौशनी कम है
गुज़रते वक्त देहलीजों के पत्थर भी नहीं दिखते
के मेरे पैरों के नाखून कितनी बार टूटें हैं-
हुई मुद्दत के चौराहे पे अब बिजली का खम्बा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुमको-
मुझे अफ़सोस है सचमुच!

-गुलज़ार

टाई

गोरे साहिब की टाई
रामू की लंगोट बनी
लेकिन यह बात आज़ादी से पहले की है

अब रामू लंगोट नही पहनता
और वैसे भी आज़ादी के बाद
हम में शर्म कहाँ रह गई है ?

रंग

“प्यार का रंग क्या होता है”
अब की बार
इस बात पर लडे थे हम

घुले हुए रंगों में
अपने पाजेब डुबोकर, तुम उड़ चले
बता गए
प्यार और विरह का एक ही होता है रंग

उस वक़्त मैं, असहाय सा
खून के रंग में,
असीमित प्रवाह में
प्यार की परछाई
ढूँढ़ रहा था शायद....

विजय © 19 फरवरी, 2008

Thursday, November 29, 2007

Kuchh aansuu.....

- कुछ आंसू नंदीग्राम से नाम



हमने यहाँ जो बीज बोये हैं
उनसे फलेंगे पहिये, फिर
तेज़ रफ़्तार चलेगी जिंदगी अपनी
उस गोली की रफ़्तार से भी तेज़
जो बगैर दर्द का एहसास दिए
तेरे बच्चे के गर्दन में धंस गई थी कल
आबादी पनपेगी शोरोगुल होगा
और इसी शोर में दबाना है हमने
हल्ला-बोल और लाल-सलाम से नारे
एक सुनहरे कल से लिए भूल जा
कि तेरी धरती कभी सोना उगलती थी
हमने यहाँ जो बीज बोये हैं
उनसे फलेंगे पहिये, फिर
तेज़ रफ़्तार चलेगी जिंदगी अपनी

Tuesday, October 10, 2006

parchaai

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